रविवार, 18 अक्तूबर 2015

अब तो दादुर बोलिहें, हमें पूछिहे कौन?

सत्ता को पाकर गुर्राना,
कैसा चेहरा, कैसी चाल?
लेखक सारे हैं उद्द्वेलित,
वापस देते हैं सम्मान,
सत्ता को दिखती राजनीति,
उल्टे सीधे दे रहे बयान,
लगी आग में घी बरसाना,
कैसा चेहरा कैसी चाल?

सत्ता मद में यूं बौराना,
चूर हुआ जनता का सपना,
मोदी क्यूँ अब मौन हो गये़?
और लगे दादुर टर्राने,
जनता करती आज सवाल,
कैसा चेहरा, कैसी चाल?

नहीं चाहिये ऐसे अच्छे दिन,
मुर्गा सस्ता, मंहगी दाल,
जनता पीती, खून के आँसू,
गौहत्या पर रोज बवाल,
भूल गये सब अपने वादे,
कैसा चेहरा, कैसी चाल?

कल तक मनमोहन का मौन,
छीन रहा था, जनता का चैन,
अब तो मोदी की जबान पर,
लगा हुआ हो जैसे बैन,
जनता पूछे यही सवाल,
कैसा चरित्र, कैसी चाल?




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