रविवार, 18 अक्तूबर 2015

अब तो दादुर बोलिहें, हमें पूछिहे कौन?

सत्ता को पाकर गुर्राना,
कैसा चेहरा, कैसी चाल?
लेखक सारे हैं उद्द्वेलित,
वापस देते हैं सम्मान,
सत्ता को दिखती राजनीति,
उल्टे सीधे दे रहे बयान,
लगी आग में घी बरसाना,
कैसा चेहरा कैसी चाल?

सत्ता मद में यूं बौराना,
चूर हुआ जनता का सपना,
मोदी क्यूँ अब मौन हो गये़?
और लगे दादुर टर्राने,
जनता करती आज सवाल,
कैसा चेहरा, कैसी चाल?

नहीं चाहिये ऐसे अच्छे दिन,
मुर्गा सस्ता, मंहगी दाल,
जनता पीती, खून के आँसू,
गौहत्या पर रोज बवाल,
भूल गये सब अपने वादे,
कैसा चेहरा, कैसी चाल?

कल तक मनमोहन का मौन,
छीन रहा था, जनता का चैन,
अब तो मोदी की जबान पर,
लगा हुआ हो जैसे बैन,
जनता पूछे यही सवाल,
कैसा चरित्र, कैसी चाल?




शनिवार, 19 सितंबर 2015

हिन्दू धर्म की अस्मिता की रक्षा करें!

हिन्दू धर्म के मतावलम्बियों की धर्म के प्रति आस्था व्यक्त करने की स्वतंत्रता ने हमारे देवी देवताओं को कभी बीड़ी के बण्डल पर, तो कभी अगरबत्ती के पैकेट पर छापने की स्वतंत्रता दे दी है|

हिन्दू धर्म की विखण्डित धर्म सत्ता का ही यह परिणाम है कि हजारों देवी देवता, सैकड़ों मत मतान्तर एक दूसरे को चुनौती देते, यहॉं तक कि हमारी अटूट श्रद्धा के केन्द्र भगवान राम और कृष्ण को भी चुनौती देने वाले मत, इस देश में मान्यता प्राप्त हैं|

शैव, वैष्णव और शाक्तों के आपसी मतभेद को मिटाने का प्रयास करने वाले आदिगुरू शंकराचार्य ने चार धाम की स्थापना करके हिन्दू धर्म को एकजुट करने में अद्वितीय सफलता पाई थी|

परन्तु आज हमारे धर्म ने जो आधुनिक और व्यावसायिक रूप लेना आरम्भ किया है, वह चिन्ता और सोच का विषय है|

Note :  हिन्दू देवी देवताओं के व्यावसायिक प्रयोग एवं फैशन के नाम पर कभी वस्त्रों पर उनके चित्र बनाना, कभी शरीर पर उनके चित्रों के टैटू बनवाने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये|

धर्म का मज़ाक सहने की यह उदारता और सहनशीलता हमारे देवी देवताओं के अपमान का कारण तो बन ही रही है; बल्कि यह समूची हिन्दू सभ्यता के  मुंह पर करारा तमाचा है|

सबसे बड़ी बात यह है कि वैलेन्टाइन डे पर हंगामा करने वाले, हिन्दुत्व के कथित ठेकेदार संगठन ऐसे विषयों पर कभी अपनी गंभीर और सतत प्रतिक्रिया नहीं देते, और इन विषयों पर भाजपा कभी अपनी संम्वेदना  नहीं प्रदर्शित करती, स्वयं सेवक संघ का स्वाभिमान आहत क्यों नहीं होता, यह अन्वेषण का विषय प्रतीत होता है|

मेरी सभी बुद्धिजीवी हिन्दू भाई बहनों से अपील है कि

1.    वे अपने परिवार और समाज में प्रतिवर्ष दीपावली के अवसर पर पुराने गणेश लक्ष्मी की प्रतिमा को अपने ही घर मे सम्मानपूर्वक उच्च स्थान प्रदान करें|

2.    पुराने धर्मग्न्थों गीता रामायण को कबाड़ी के हाथ बेच कर उनका अपमान न करें,

3.   शादी विवाह के अवसर पर, शादी के कार्ड पर देवी देवताओं के चित्र न छपवायें एवं

4.    शादी के कार्डों में पवित्र श्लोक न छपवायें तो शायद इससे गणेश जी की कृपा अधिक मिलेगी|

5.     क्योंकि जब कार्ड कूड़े के ढेर पर फेंका जाता है तो उसमें छपे देवी देवताओं के अपमान का दोष किस पर आता है, क्या आपने कभी सोचने का प्रयास किया| आपके घर में आने वाले कार्डों का आप क्या करते हैं?

6.    कम से कम देवी देवताओं के चित्र काट कर, किसी एक कापी में चिपका कर, उनका अपमान होने से बचा सकते हैं|

शनिवार, 29 अगस्त 2015

रक्षा ही नहीं यह सूत्र है आत्मीयता का!

रक्षा बन्धन का पर्व है, बहनों का उत्सव है, भाइयों को उनके दायित्व की याद दिलाने का त्यौहार है|

आर्य सभ्यता की यह मौलिक विशेषता ही उसे विश्व की सबसे पुरानी और विकसित सभ्यता सिद्ध करता है|

वैसे तो हर मानव सभ्यता की कुछ मौलिक विशेषतायें हैं| मानव जाति ने इन्ही जीवन शैलियों को, धर्म का नाम दे दिया|

रक्षा के बन्धन के द्वारा सम्बन्धों को एक दूसरे से बॉंधने की जो महत्वपूर्ण पहल, आर्य सभ्यता के पूर्वजों और ॠषियों के द्वारा पारिवारिक सम्बन्धों को गहनता के साथ एक दूसरे से जोड़ने की अद्भुत संयोजनशीलता की अन्तर्निहित भावना से प्रेरित है|

हजारों सालों से बहनें, अपने भाइयों की लम्बी उम्र की कामना करते  हुये उन्हें अपनी रक्षा के वचन से बॉंधती आ रही हैं|

कहा जाता है आज के दिन ही राजा बलि द्वारा अनधिकारपूर्वक कब्जा किये गये इन्द्र के राज्य को मुक्त कराने हेतु, भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर, बलि से तीन पग भूमि का दान देने के वचन लेकर, उसे वचन की रक्षा के बन्धन में, बॉंधने के लिये रक्षा सूत्र का प्रयोग किया था, फिर बलि के वचन में बंध जाने के बाद पहले पग में धरती, दूसरे में आकाश नाप लिया और तीसरे पग की भूमि मॉंग कर, राजा बलि के अहंकार का मर्दन किया था|

उस दृष्टि से देखा जाय तो यह पर्व वचन की मर्यादा से बंधने की प्रेरणा तो देता ही है, साथ ही अपने गुणों पर अहंकार निषेध का भी पाठ पढ़ाता है; जब त्रैलोक्य विजेता बलि का अहंकार नष्ट हो गया, तो फिर आम मनुष्य का अहं कैसे शेष रहेगा|

ऐसे मे मुझे विषय से हटकर कॉंग्रेस पार्टी का अहंकार, जब उसने काले धन के मुद्दे पर आवाज़ उठाने वाले रामदेव के दमन का अहंकार दिखाया था; अन्ना की लोकपाल बिल लाने की आवाज़ को तिहाड़ जेल में बंद करने का प्रयास किया था, एवम् केजरीवाल की भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ की अनदेखी की थी, सो भारत की वामन स्वरूप जनता ने, कांग्रेस पार्टी के सत्तामद को चकनाचूर करते उसे बौना बना दिया|

मोदी और केज़रीवाल भले ही इसे अपनी विजय मान कर गौरवान्वित अनुभव कर रहे हों, परन्तु यह जीत भी उसी के पास तब तक सुरक्षित है, जब तक वह अपने घोषणापत्रों में लिये गये वचनों की मर्यादा का पालन करते रहें|

जनता को वामन समझते हुये, उसे दान देने का वैसा दर्प न दिखायें, जैसा कि स्वयं को प्रधान सेवक कहने वाले मोदी ने अभी हाल में बिहार की एक चुनावी जनसभा में हजारों करोड़ की केन्द्रीय सहायता को इस तरह से दर्शाया जैसे मानो वे कोई राजा बलि की भांति सम्राट हों, और बिहार की जनता वामन|

ऱक्षा बन्धन के संदर्भ में दूसरी पौराणिक कथा, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल को सुदर्शन चक्र द्वारा, उसकी अभद्रता की सीमा पार करने पर मृत्युदण्ड देने के पश्चात उनकी उंगली से रक्त बहते देख द्रौपदी ने भरी राज्यसभा के बीच, पटरानी होने का अभिमान भूल कर, अपनी  साड़ी से एक पट्टी फाड़कर, श्रीकृष्ण की उंगली पर बॉंध दी थी, और भगवान श्रीकृष्ण ने उसी समय, द्रौपदी को वचन देते हुये कहा था, हे द्रौपदी मैं तुम्हारी इस पट्टी के एक एक धागे का ॠणी हो गया हूँ|

फिर आपको ज्ञात ही होगा, कौरवों द्वारा अपमानित कर वस्त्रहरण के प्रयास के समय, भरी राज्यसभा में किसी से भी सहायता न मिल पाने पर, कृष्ण को पुकारा था; तब भगवान श्रीकृष्ण ने सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान रूप का परिचय देते हुये, वस्त्रावतार ले लिया और द्रौपदी की लाज़ की रक्षा की|

रक्षा सूत्र की महिमा, वचन की मर्यादा, स्नेह, ममता और पवित्र प्रेम को संजोये हुये है| इसकी पर्व का महात्म्य दिखता है, जब हमारी बुआ, पिता जी को भावविभोर होकर रक्षासूत्र बॉंधतीं हैं, और पिताजी अपनी बहन के चरणस्पर्श कर, उन्हें वचन निर्वाह के लिये आश्वस्त करते हैं|

बिना कुछ बोले कहे हुये ही ये धागे बहुत कुछ कहते हैं|

कोरियर से लेकर, पूरा डाक विभाग, बहनों के रक्षाबंधन सन्देश को  पहुंचाने में कटिबद्ध हो जाता है, करोड़ों रुपये की राखियों की बिक्री होती है| भारतीय पर्वों में हमारी अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने की विशाल शक्ति भी अन्तर्निहित है|

भारत की सभ्यता का यह अद्भुत  और अद्वितीय पर्व है, जिसमें वैवाहिक जीवन के दायित्वों में उलझे भाई बहनों को, बचपन की सुहानी यादें ताजा हो जाती हैं, वो लड़ना, झगड़ना, बहन का मात्रवत् भाई की चिन्ता करना, भाई का पित्रवत् बहनों की सुरक्षा की चिन्ता करना आदि|

बहन और भाई प्रेम, पवित्र और निष्काम प्रेम का अनुपम उदाहरण है; आज फिर वही पर्व आया है, करोड़ो बहनें, अपने भाइयों के जीवन की मंगल कामना कर रही हैं; भाई बहनों के हाथों से टीका लगवा कर, मुंह मीठा करते हुये, बहनों के प्रति अपने प्रेम और सम्मान को व्यक्त कर रहे हैं|

वक्त की मॉंग है कि आज बहनें अपने भाई से, देश भर की दूसरी बहनों की सुरक्षा का वचन मॉंग रही है, भाइयों को बजरंगी बन, अपने मित्रों के सहयोग से, दुराचारियों को सबक सिखाना ही होगा; और नारी जाति की अस्मिता की रक्षा का संकल्प लेना ही होगा, आइये हम ये पवित्र संकल्प ले कर इस पर्व को अधिक सार्थक स्वरूप प्रदान करें|          -तेज प्रकाश

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आरक्षण की आग बुझाओ!

पटेल आरक्षण की आग में पूरा गुजरात तप रहा है; मगर उसकी लपटें देश के अन्य सामान्य से लेकर पिछड़े वर्गों को आन्दोलन के लिये उत्तेजित कर रही होंगी|

आरक्षण का उद्भव संविधान निर्माताओं के मन में, समाज के हर वर्ग को समाज की मुख्य धारा में लाना रहा होगा|

आज आरक्षण समाज में विषमता और वैमनस्य की जन्म देते हुये, राजनीति के आंगन में विषबेल की तरह फैलता जा रहा है| समाज को, धर्मके नाम पर, जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति के नाम पर,पहले से भी अधिक बंटता ज्रहा है|

स्वार्थ के लोभ में, सरकारी नौकरियों में आरक्षण की आग भड़काना देशद्रोह जैसा घृणित कार्य है|

गरीबी, किसी जाति विशेष के लोगों में ही हो ऐसा कदापि नहीं है| आरक्षण केवल गरीब को मिलना चाहिए, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो, आर्थिक आधार पर आरक्षण|

यही एकमात्र समाधान है, असमानता और असंतोष को मिटाने का| वरना किसको किसको आरक्षण देंगे?

राजनीति बंद कर, राजनैतिक इच्छाशक्ति का इस्तेमाल कर, मोदी सरकार को, लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल की तर्ज पर, आरक्षण समाप्त कर, जनहित और राष्ट्र हित में, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू कर देना चाहिये|